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Thursday, March 5, 2026
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पुरातन भारत के ऋषि मुनि माहिर थे इन अलौकिक साधना की शक्ति और सिद्धियों में

अष्ट सिद्धि और शक्तिया जो पुरातन ऋषि मुनियो को बल प्रदान करती थी उनके आशीर्वाद और श्राप को शक्ति प्रदान करती थी.

सभी सिद्धिया मन से संचालित है. प्राचीन भारत में रहने वाले सिद्ध ऋषि-मुनियो के पास सिद्धिया होती थी.

वो किसी एक चीज को करने में माहिर होते थे. जैसे की किसी दूसरी देह में प्रवेश करना जो आदि गुरु श्री शंकराचार्य ने कर दिखाया था. इसके अलावा वायु पर विचरण या फिर अग्नि संयम ये कुछ विद्याए थी जिन्हें संयम करने पर कुछ सिद्धिया आती थी.

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अष्ट सिद्धि और शक्तिया जो जिनसे ऋषि मुनि प्रभावशाली बनते थे
आज की पोस्ट इन्ही कुछ सिद्धियों का वर्णन करती है.

अगर इन सिद्धियों को अध्यात्म की नजर से देखे तो किसी चमत्कार से कम नहीं लगता है. मगर विज्ञान में ये सिद्ध हो गया है की इन सबके पीछे मन के संयम है.

हम खुद को जो बनाना चाहे बना सकते है. बशर्ते उस चीज का संयम करना आता है.जैसे की एक मजबूत आत्मबल के साथ अगर भावना दी जाये तो हमें कड़ाके की सर्दी में भी गर्मी लग सकती है. ये हमारे मन की शक्ति है.

क्यों की हमने मस्तिष्क की पूर्वनिर्धारित सोच और हमारे शरीर की क्रिया पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता में बदलाव कर लिया. आइये जानते है ऐसी ही कुछ शक्तिया और सिद्धिया जिन्हें प्राचीन समय में हमारे ऋषि मुनि हासिल किये रखते थे.

अष्ट सिद्धि और शक्तिया जो जिनसे ऋषि मुनि प्रभावशाली बनते थे

1.) अणिमा शरीर को जितना चाहे सूक्ष्म बना लेना अणिमा सिद्धि है. लघु होकर इंसान दुसरो की नजरो से अदृश्य भी हो सकता है. इससे इंसान बल और शक्तिशाली बन जाता है.

2.) महिमा शरीर को विशाल और विकराल रूप देने की सिद्धि जो इंसान को विस्तार प्रदान करती है.

3.) लघिमा स्वयं को हल्का बना लेने की शक्ति जो इंसान को वायुमंडल में विचरण के लायक बनाती है.

4.) गरिमा स्वयं को गजराज जैसा भारी बना लेने की सिद्धि जिसमे हम खुद में भारीपन महसूस करते है. कहा जाता है की हाथो में एक नाड़ी का अस्तित्व है जिसमे कूप वायु भर जाने पर भी यही अनुभव होता है.

5.) प्राप्ति जिस चीज की कामना करे वही उपलब्ध हो ये सिद्धि इसे संभव बनाती है.

6.) प्रकाम्य किसी भी रूप की कल्पना मात्र से धारण कर लेना इस सिद्धि का काम है. अष्ट सिद्धि और शक्तिया में ये मायावी सिद्धि है.

7.) इशीता किसी के बारे में भी जान लेना बगैरउसको जाने इशिता सिद्धि का काम है. ये शक्ति / सिद्धि भी मन संचालित है और कहा जाता है की चित पर संयम करने से हम दुसरो के मन की बात जान सकते है.

8.) वशीकरण सम्पूर्ण जगत और प्रकृति पर अपना वश जमाना वशिता सिद्धि का काम है. वशीकरण मोहिनी कला इसका एक उदहारण है.

ये थी अष्ट सिद्धिया अब बात करते है कुछ और शक्तियों की जिसमे हमारे पुरातन काल के पूर्वज और ऋषि मुनि माहिर थे. चलिए अष्ट सिद्धि और शक्तिया के बारे मे और जानते है.

1.) उदान शक्ति

उदानवायु के जीतने पर योगी को जल, कीचड़ और कंकड़ तथा कांटे आदि पदार्थों का स्पर्श नहीं होता और मृत्यु भी वश में हो जाती है.

कंठ से लेकर सिर तक जो व्यापाक है वही उदान वायु है. प्राणायम द्वारा इस वायु को साधकर यह सिद्धि प्राप्त की जा सकती है.

2.) कर्म सिद्धि

सोपक्रम और निरपक्रम, इन दो तरह के कर्मों पर संयम से मृत्यु का ज्ञान हो जाता है. सोपक्रम अर्थात ऐसे कर्म जिसका फल तुरंत ही मिलता है और निरपक्रम जिसका फल मिलने में देरी होती है.

क्रिया, बंध, नेती और धौती कर्म से कर्मों की निष्पत्ति हो जाती है.

3.) स्थिरता शक्ति

शरीर और चित्त की स्थिरता आवश्यक है अन्यथा सिद्धियों में गति नहीं हो सकती.

कूर्मनाड़ी में संयम करने पर स्थिरता होती है. कंठ कूप में कच्छप आकृति की एक नाड़ी है. उसको कूर्मनाड़ी कहते हैं. कंठ के छिद्र जिसके माध्यम से उदर में वायु और आहार आदि जाते हैं उसे कंठकूप कहते हैं.

4.) दिव्य श्रवण शक्ति

समस्त स्रोत और शब्दों को आकाश ग्रहण कर लेता है, वे सारी ध्वनियां आकाश में विद्यमान हैं.

आकाश से ही हमारे रेडियो या टेलीविजन यह शब्द पकड़ कर उसे पुन प्रसारित करते हैं. कर्ण-इंद्रियां और आकाश के संबंध पर संयम करने से योगी दिव्यश्रवण को प्राप्त होता है.

अर्थात यदि हम लगातार ध्‍यान करते हुए अपने आसपास की ध्वनि को सुनने की क्षमता बढ़ाते जाएं और सूक्ष्म आयाम की ध्वनियों को सुनने का प्रयास करें तो योग और टेलीपैथिक विद्या द्वारा यह सिद्धि प्राप्त की जा सकती है.

5.) अष्ट सिद्धि और शक्तिया-कपाल सिद्धि

सूक्ष्म जगत को देखने की सिद्धि को कपाल सिद्धि योग कहते हैं. कपाल की ज्योति में संयम करने से योगी को सिद्धगणों के दर्शन होते हैं. मस्तक के भीतर कपाल के नीचे एक छिद्र है, उसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं.

ब्रह्मरंध्र के जाग्रत होने से व्यक्ति में सूक्ष्म जगत को देखने की क्षमता आ जाती है.

Astral projection guided meditation

हालांकि आत्म सम्मोहन योग के द्वारा भी ऐसा किया जा सकता है. बस जरूरत है तो नियमित प्राणायाम और ध्यान की. दोनों को नियमित करते रहने से साक्षीभाव गहराता जाएगा तब स्थि‍र चित्त से ही सूक्ष्म जगत देखने की क्षमता हासिल की जा सकती है.

6.) प्रतिभ शक्ति

प्रतिभ में संयम करने से योगी को संपूर्ण ज्ञानी की प्राप्त होती है. ध्यान या योगाभ्यास करते समय भृकुटि के मध्‍य तोजोमय तारा नजर आता है. उसे प्रतिभ कहते हैं. इसके सिद्ध होने से व्यक्ति को अतीत, अनागत, विप्रकृष्ट और सूक्ष्माति-सूक्ष्म पदार्थों का ज्ञान हो जाता है.

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7.) निरोध परिणाम सिद्धि

इंद्रिय संस्कारों का निरोध कर उस पर संयम करने से ‘निरोध परिणाम सिद्धि’ प्राप्त होती है.

यह योग साधक या सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुक के लिए जरूरी है अन्यथा आगे नहीं बढ़ा जा सकता. निरोध परिणाम सिद्धि प्राप्ति का अर्थ है कि अब आपके चित्त में चंचलता नहीं रही.

निश्चल अकंप चित्त में ही सिद्धियों का अवतरण होता है. इसके लिए अपने विचारों और श्वासों पर लगातार ध्यान रखें. विचारों को देखते रहने से वह कम होने लगते हैं. विचार शून्य मनुष्य ही स्थिर चित्त होता है.

8.) अष्ट सिद्धि और शक्तिया-चित्त ज्ञान शक्ति

हृदय में संयम करने से योगी को चित्त का ज्ञान होता है.

चित्त में ही नए-पुराने सभी तरह के संस्कार और स्मृतियां होती हैं. चित्त का ज्ञान होने से चित्त की शक्ति का पता चलता है.

9.) इंद्रिय शक्ति

ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अव्वय और अर्थवत्तव नामक इंद्रियों की पांच वृत्तियों पर संयम करने से इंद्रियों का जय हो जाता है. अष्ट सिद्धि और शक्तिया में से एक है अपने पञ्च इन्द्रियों का संयम

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10.) पुरुष ज्ञान शक्ति

बुद्धि पुरुष से पृथक है. इन दोनों के अभिन्न ज्ञान से भोग की प्राप्ति होती है. अहंकारशून्य चित्त के प्रतिबिंब में संयम करने से पुरुष का ज्ञान होता है.

11.) तेजपुंज शक्ति

समान वायु को वश में करने से योगी का शरीर ज्योतिर्मय हो जाता है. नाभि के चारों ओर दूर तक व्याप्त वायु को समान वायु कहते हैं. ये अष्ट सिद्धि और शक्तिया का ही एक भाग है.

12.) ज्योतिष शक्ति

ज्योति का अर्थ है प्रकाश अर्थात प्रकाश स्वरूप ज्ञान. ज्योतिष का अर्थ होता है सितारों का संदेश. संपूर्ण ब्रह्माण्ड ज्योति स्वरूप है. ज्योतिष्मती प्रकृति के प्रकाश को सूक्ष्मादि वस्तुओं में न्यस्त कर उस पर संयम करने से योगी को सूक्ष्म, गुप्त और दूरस्थ पदार्थों का ज्ञान हो जाता है.

14.) अष्ट सिद्धि और शक्तिया-लोक ज्ञान शक्ति

सूर्य पर संयम से सूक्ष्म और स्थूल सभी तरह के लोकों का ज्ञान हो जाता है.

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15.) नक्षत्र ज्ञान सिद्धि

चंद्रमा पर संयम से सभी नक्षत्रों को पता लगाने की शक्ति प्राप्त होती है.

16.) तारा ज्ञान सिद्धि

ध्रुव तारा हमारी आकाश गंगा का केंद्र माना जाता है. आकाशगंगा में अरबों तारे हैं. ध्रुव पर संयम से समस्त तारों की गति का ज्ञान हो जाता है.

17.) परकाय प्रवेश

बंधन के शिथिल हो जाने पर और संयम द्वारा चित्त की प्रवेश निर्गम मार्ग नाड़ी के ज्ञान से चित्त दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है. यह बहुत आसान है, चित्त के स्थिरता से शूक्ष्म शरीर में होने का अहसास बढ़ता है.

शरीर से बाहर मन की स्वाभाविक वृत्ति है उसका नाम ‘महाविदेह’ धारणा है. उसके द्वारा प्रकाश के आवरणा का नाश हो जाता है. परकाया प्रवेश प्रभावशाली अष्ट सिद्धि और शक्तिया में से एक है.

Astral projection through meditation

स्थूल शरीर से शरीर के आश्रय की अपेक्षा न रखने वाली जो मन की वृत्ति है उसे ‘महाविदेह’ कहते हैं. उसी से ही अहंकार का वेग दूर होता है. उस वृत्ति में जो योगी संयम करता है, उससे प्रकाश का ढंकना दूर हो जाता है.

18.) सर्वज्ञ शक्ति

बुद्धि और पुरुष में पार्थक्य ज्ञान सम्पन्न योगी को दृश्य और दृष्टा का भेद दिखाई देने लगता है. ऐसा योगी संपूर्ण भावों का स्वामी तथा सभी विषयों का ज्ञाता हो जाता है.

19.) भाषा सिद्धि

हमारे मस्तिष्क की क्षमता अनंत है. शब्द, अर्थ और ज्ञान में जो घनिष्ट संबंध है उसके विभागों पर संयम करने से ‘सब प्राणियों की वाणी का ज्ञान’ हो जाता है.

20.) समुदाय ज्ञान शक्ति

शरीर के भीतर और बाहर की स्थिति का ज्ञान होना आवश्यक है. इससे शरीर को दीर्घकाल तक स्वस्थ और जवान बनाए रखने में मदद मिलती है. नाभिचक्र पर संयम करने से योगी को शरीर स्थित समुदायों का ज्ञान हो जाता है अर्थात कौन-सी कुंडली और चक्र कहां है तथा शरीर के अन्य अवयव या अंग की स्थिति कैसी है.

21.) पंचभूत सिद्धि

पंचतत्वों के स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्तव ये पांच अवस्‍था हैं इसमें संयम करने से भूतों पर विजय लाभ होता है. इसी से अष्टसिद्धियों की प्राप्ति होती है.

अष्ट सिद्धि और शक्तिया में यहाँ संयम का अर्थ है जिस चीज या वस्तु का संयम हम करने जा रहे है उसकी गुण-धर्म और प्रकृति को अपनाना.

ऐसा करने से हमारे अंदर उसकी प्रकृति बनने लगती है. जैसे चंद्रमा संयम से मन शीतल और शांत बनता है वही अग्नि संयम से मन उग्र. आज की पोस्ट अष्ट सिद्धि और शक्तिया आपको कैसी लगी कमेंट के माध्यम से जरूर बताये. हमें subscribe करना ना भूले.

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