महाकाली साधना का सनातन धर्म में काफी महत्त्व है. इनके स्वरूप की कल्पना करने से ही शरीर में सिहरन सी होने लगती है. ये साधना तीक्ष्ण प्रभाव से युक्त होती है और साधक के मूलाधार चक्र से जुड़ी होती है.
माना जाता है की इनकी साधना में कई कठिन नियम होते है जिनका पालन करना जरुरी होता है और इसके अभाव में महाकाली साधना के दुष्प्रभाव देखने को मिल सकते है. यही वजह है की इस साधना को पूरा करना हर किसी के बस की बात नहीं होती है.
आइये जानते है माँ काली की साधना से जुड़ी कुछ खास बाते और उच्चाटन प्रयोग के बारे में.
महाकाली शमशानी साधना एक खास साधना में से एक है जिसमे साधना को शमसान में संपन्न किया जाता है. जो लोग गृहस्थ होते है उन्हें इस साधना के लिए मनाही की जाती है क्यों की इस साधना से जुड़े कई नियम ऐसे है जिन्हें गृहस्थ व्यक्ति नहीं कर सकता है.
दस महाविद्या में से एक महाकाली सिद्ध साधना तुरंत प्रभाव और फल देने वाली साधना में से एक है जिन्हें कर आप शत्रु दमन, धन वैभव प्राप्त कर सकते है.

उनका प्रिय वार शुक्रवार है और प्रिय तिथि अमावस्या है.
मां काली का सरल मंत्र है- ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा.
महाकाली की प्रसन्नता के लिए उनकी फोटो या प्रतिमा के समक्ष मंत्र जाप करना चाहिए.
पूर्ण श्रद्धा से मां काली की उपासना से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं. ऐसा माना जाता है की तंत्र लोग से जुड़े लोगो की गति मुश्किल होती है लेकिन इस साधना को सिद्ध करने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है.
अगर आप शत्रु से परेशान है और धन वैभव की कमी से जूझ रहे है तो आपको महाकाली सिद्ध शाबर साधना को संपन्न करना चाहिए.
देवी के 4 स्वरूप है 1 दक्षिण काली, 2 शमसान काली, 3 माँ काली और 4 महाकाली इनका प्रभाव साधना के अनुसार देखने को मिलता है. आइये जानते है सबकुछ डिटेल से.
महाकाली साधना सिद्धि
दस महाविद्याओं में सर्वश्रेष्ठ महाकाली कलियुग में कल्पवृक्ष के समान शीघ्र फलदायक एवं साधक की समस्त कामनाओं की पूर्ति में सहायक हैं.
जब जीवन के पुण्य जाग्रत होते है. तभी साधक ऐसी प्रबल शत्रुहन्ता, महिषासुर मर्दिनी, वाक् सिद्धि प्रदायक महाकाली की साधना में रत होता है.
जो साधक इस साधना में सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसके जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता और भोग तथा मोक्ष दोनों में समान रूप से सम्पन्नता प्राप्त कर वह जीवन में सभी दृष्टियों से पूर्णता प्राप्त कर लेता है.
संसार में सैकड़ों-हजारों साधनाएं हैं, परन्तु हमारे महर्षियों ने इन सभी साधनाओं में दस महाविद्याओं की साधना को प्रमुखता और महत्व दिया है.
जो साधक अपने जीवन में जितनी ही महाविद्या साधनाएं सम्पन्न करता है, वह उतना ही श्रेष्ठ साधक बन सकता है, परन्तु बिना भाग्य के इस प्रकार की महत्वपूर्ण साधनाओं को सिद्ध करने का अवसर नहीं मिलता.
दस महाविद्याओं में भी काली महाविद्या सर्वप्रमुख, महत्वपूर्ण और अद्वितीय कही गई है, क्योंकि यह त्रिवर्गात्मक महादेवियों महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती में प्रमुख है.
शास्त्रों के अनुसार मात्र महाकाली साधना से ही जीवन की समस्त कामनाओं की पूर्ति और मनोवांछित फल प्राप्ति सम्भव होती है.
इस सम्बन्ध में हम साधनात्मक ग्रंथों को टटोल कर देखें तो लगभग सभी योगियों, संन्यासियों, विचारकों, साधकों और महर्षियों ने एक स्वर से महाकाली साधना को प्रमुखता और महत्व प्रदान किया है.
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साधना का महत्व
दस महाविद्याओं में प्रमुख और शीघ्र फलदायक होने के कारण पिछले हजारों वर्षों में हजारों-हजारों साधक इस साधना को सम्पन्न करते आये हैं और उच्चकोटि के साधकों के मन में भी यह तीव्र लालसा रहती है, कि अवसर मिलने पर किसी प्रकार से महाकाली साधना सम्पन्न कर ली जाय.
फिर भी जिन साधकों ने काली साधना को सिद्ध किया है, उनके अनुसार निम्न तथ्य तो साधना सम्पन्न करते ही प्राप्त हो जाते हैं.
अथ कालीमन्वक्ष्ये सद्योवाक्सिद्धिपायकान् . आरावितैर्यः सर्वेष्टं प्राप्नुवन्ति जना भुवि ||
- अर्थात् काली साधना से तुरन्त वाक् सिद्धि (जो भी कहा जाय, वह सत्य हो जाय) तथा इस लोक में समस्त मनोवांछित फल प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है.
- इस साधना को सिद्ध करने से व्यक्ति समस्त रोगों से मुक्त होकर पूर्ण स्वस्थ, सबल एवं सक्षम होता है.
- यह साधना जीवन के समस्त भोगों को दिलाने में समर्थ है, साथ ही काली साधना से मृत्यु के उपरान्त मोक्ष प्राप्ति होती है.
- शत्रुओं का मान मर्दन करने, उन पर विजय पाने, मुकदमे में सफलता और पूर्ण सुरक्षा के लिए इससे बढ़कर कोई साधना नहीं है.
- इस साधना से दस महाविद्याओं में से एक महाविद्या सिद्ध हो जाती है, जिससे सिद्धाश्रम जाने का मार्ग प्रशस्त होता है.
- इस साधना की सिद्धि से तुरन्त आर्थिक लाभ और प्रबल पुरुषार्थ प्राप्ति सम्भव होती है.
- ‘काली पुत्रे फलप्रदः’ के अनुसार काली साधना योग्य पुत्र की प्राप्ति व पुत्र की उन्नति, उसकी सुरक्षा और उसे पूर्ण आयु प्रदान करने के लिए श्रेष्ठ साधना कही गई है.
वस्तुतः काली साधना को संसार के श्रेष्ठ साधकों और विद्वानों ने अदभुत और शीघ्र सिद्धि देने वाली साधना कहा है, इस साधना से साधक अपने जीवन के सारे अभाव को दूर कर अपने भाग्य को बनाता हुआ पूर्ण सफलता प्राप्त करता है.
साधना के अनुकूल समय
महाविद्या साधनाओं में नवरात्रि का तो विशेष महत्व रहता है. क्योंकि ये दिन इस प्रकार की साधनाओं के लिए सर्वोपरि हैं.
फिर आश्विन शुक्ल प्रतिप्रदा से जो नवरात्रि प्रारम्भ होती है, वह तो महत्वपूर्ण है ही, इसलिए साधक को चाहिए कि वे नवरात्रि का चयन इस प्रकार की साधना के लिए विशेष रूप से करें.
जो साधक अपने गृहस्थ जीवन में सभी प्रकार की उन्नति चाहते हैं, जो निष्काम भाव से काली की साधना सम्पन्न कर साक्षात् दर्शन करना चाहते हैं, जो अपने जीवन में भोग और मोक्ष दोनों फल समान रूप से प्राप्त करना चाहते है, उन्हें अवश्य ही महाकाली साधना सम्पन्न करनी चाहिए.
जिससे कि वे अपने जीवन में सभी दृष्टियों से पूर्णता श्रेष्ठता और अपने भाग्य को मनोनुकूल बना सकें.
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सरल साधना
यद्यपि महाकाली साधना महाविद्या साधना है और महाशक्ति की आधारभूत महाविद्या है, फिर भी अन्य साधनाओं की अपेक्षा सुगम और सरल है, साथ ही साथ यह सौम्य साधना है, इसका कोई विपरीत प्रभाव या परिणाम प्राप्त नहीं होता.
सही अर्थों में देखा जाय तो महाकाली साधना सरल और गृहस्थों के करने के लिए ही है.
मंत्रात्मक साधना होने के कारण अनुकूल, शीघ्र प्रभावी और श्रेष्ठ साधना है. इस साधना को पुरुष या स्त्री कोई भी कर सकता है, योगी और संन्यासी कर सकता है, जो अपने जीवन के अभावों को दूर करना चाहता है, उसके लिए यह स्वर्णिम अवसर है कि वह इन अवसरों का लाभ उठाकर महाकाली साधना सम्पन्न करे.

प्रत्यक्ष दर्शन : सबसे बड़ी बात यह है कि नवरात्रि में महाकाली साधना करने पर भगवती के प्रत्यक्ष दर्शन सम्भव होते हैं. यदि साधक पूर्ण श्रद्धा के साथ इस साधना को सम्पन्न करे.
कई साधकों ने इस बात को अनुभव किया है, कि श्रद्धा और विश्वास के साथ यह साधना सम्पन्न होते ही भगवती महाकाली के दर्शन हो जाते हैं.
मेरी राय में यह कलियुग में हम लोगों का सौभाग्य है कि इस प्रकार की साधना हमारे बीच में है, जिससे कि हम भगवती काली के प्रत्यक्ष दर्शन कर अपने जीवन को धन्य कर सके.
शीघ्र प्रभाव
साधनात्मक दृष्टि से यह साधना यदि पूर्ण मनोनुकूल अवस्था में सम्पन्न की जाय, तो इसके शुभ एवं शीघ्र प्रभाव दृष्टिगोचर होते हैं.
इसके लिए मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त महाकाली यंत्र और पूर्ण चैतन्य महाकाली चित्र सामने रख कर साधना करनी चाहिए. इसके अभाव मे साधना पूर्ण सफलतादायक नहीं होती.
यदि साधना न की जाय और केवल मात्र घर में ही इस प्रकार का चैतन्य यंत्र और चित्र स्थापित हो जाता है, तो निश्चय ही उसी दिन से अनुकूल परिणाम प्राप्त होने लगते हैं, जिसका अनुभव साधक शीघ्र ही करने लगता है.
साधना विधि
साधक प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर अपने घर में किसी एकान्त स्थान अथवा पूजा कक्ष में चैतन्य मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त महाकाली यंत्र एवं महाकाली चित्र स्थापित करें.
यदि वह चाहे तो अकेला या अपनी पत्नी के साथ बैठकर पूजन कार्य कर सकता है.
पूजन के लिए कोई जटिल विधि-विधान नहीं है. यंत्र व चित्र पर कुंकुंम, अक्षत, पुष्प व प्रसाद चढ़ाकर संकल्प करें, कि मैं समस्त कामनाओं की पूर्ति सिद्धि केलिए महाकाली साधना कर रहा हूँ.
सर्वप्रथम गणपति पूजन व गुरु ध्यान कर इस साधना में साधक को प्रवृत्त होना चाहिए. साधक को चाहिए कि वह नित्य लगभग पन्द्रह हजार मंत्र जप सम्पन्न करे अर्थात् 150 मालाएं यदि नित्य साधक सम्पन्न करता है, तो आठ दिन में एक लाख मंत्र जप पूर्ण कर सकता है, जिससे कि उसे सिद्धि एवं अनुकूलता प्राप्त हो जाती है.
साधना काल में ध्यान रखने योग्य तथ्य
- जो साधक या गृहस्थ महाकाली साधना सम्पन्न करना चाहे, उसे निम्न तथ्यों का पालन करना चाहिए, जिससे कि वह अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त कर सके
- महाकाली साधना किसी भी समय से प्रारम्भ की जा सकती है, परन्तु नवरात्रि में इस साधना का विशेष महत्व है. नवरात्रि के प्रथम दिन से ही इस साधना को प्रारम्भ करना चाहिए और अष्टमी को इसका समापन किया जाना शास्त्र सम्मत है.
- इस साधना में कुल एक लाख मंत्र जप किया जाता है. यह नियम नहीं है, कि नित्य निश्चित संख्या में ही मंत्र जप हो, परन्तु यदि नित्य पन्द्रह हजार मंत्र जप होता है, तो उचित है.
- यह साधना पुरुष या स्त्री कोई भी कर सकता है, परन्तु यदि स्त्री साधना काल में रजस्वला हो जाय, तो उसी समय उसे साधना बंद कर देनी चाहिए. साधना काल में स्त्री संसर्ग वर्जित है, साधक शराब आदि न पिये और न जुआ खेले.
- साधना प्रात या रात्रि दोनों समय में की जा सकती है, यदि साधक चाहे तो प्रातःकाल और रात्रि दोनों ही समय का उपयोग कर सकता है. साधना काल में रुद्राक्ष की माला का प्रयोग ज्यादा उचित माना गया है.
- आसन सूती या ऊनी कोई भी हो सकता है, पर वह काले रंग का हो. यदि घर में साधना करे तो साधक पूर्व दिशा की तरफ मुंह करके बैठे, सामने घी का दीपक लगा ले, अगरबत्ती लगाना अनिवार्य नहीं है.
- साधक के सामने पूर्ण चैतन्य महाकाली यंत्र और महाकाली चित्र फ्रेम में मढ़ा हुआ स्थापित होना चाहिए, जो कि मंत्र सिद्ध व प्राण प्रतिष्ठा युक्त हो .
- प्रथम दिन महाकाली देवी का पूजन कर उसका ध्यान कर मंत्र जप प्रारम्भ कर देना चाहिए, पूजन में कोई जटिल विधि-विधान नहीं है, साधक मानसिक या पंचोपचार पूजन कर सकता है.
- रात्रि में भूमि शयन करना चाहिए, खाट या पलंग का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए.
- भोजन एक समय एक स्थान पर बैठ कर जितना भी चाहे किया जा सकता है, पर शराब, मांस, लहसुन, प्याज आदि का निषेध है.
अनुभव
साधक जब साधना आरम्भ करता है, तो तीसरे दिन ही उसे घर के साधना कक्ष में सुगन्ध का एहसास होता है. यह सुगन्ध अपने आप में अवर्णनीय होती है, चौथे या पांचवें दिन उसे कमरे में किसी की उपस्थिति का एहसास होता है.
आठवें दिन उस जगज्जननी महाकाली के प्रत्यक्ष या बिम्बात्मक रूप में दर्शन हो जाते हैं.
इसके लिए अखण्ड श्रद्धा और विश्वास के साथ साधना आवश्यक है. साधना के मध्य कुछ अप्रिय स्थितिया आ सकती है, लेकिन साधक को चाहिए कि वह अविचलित भाव से साधना को नियमित रखें.
महाकाली साधना प्रयोग
प्रथम दिन स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर आसन पर पूर्व की ओर मुंह कर सामने शुद्ध घृत का दीपक लगाकर तथा महाकाली यंत्र व चित्र को स्थापित कर उसकी पूजा करें, इसके पूर्व गणपति और गुरु पूजन आवश्यक है.
इसके बाद दाहिने हाथ में जल लेकर हिन्दी में ही संकल्प लिया जा सकता है, कि मैं अमुक तिथि तक एक लाख मंत्र जप अमुक कार्य के लिए कर रहा हूं, आप मुझे शक्ति दें, जिससे कि मैं अपनी साधना में सफलता प्राप्त कर सकूँ ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल जमीन पर छोड़ देना चाहिए. इसके बाद नित्य संकल्प करने की आवश्यकता नहीं है.
फिर निम्नलिखित महाकाली ध्यान करें
शवारूदाम्महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीम् चतुर्भुजां खड्गमुण्डवराभयकरां शिवाम् ..
मुण्डमालाधरान्देवीं लोलजिह्वान्दिगम्बरां एवं संचिन्तयेत्कालीं श्मशानालयवासिनीम् ..
ध्यान के बाद निम्नलिखित मंत्र का जप प्रारम्भ करें, जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, इस मंत्र की रुद्राक्ष माला से नित्य एक सौ पचास मालाएं सम्पन्न होनी चाहिए
मंत्र
॥ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं स्वाहा॥
वस्तुत यह मंत्र अपने आप में अद्वितीय महत्वपूर्ण शीघ्र सिद्धिप्रद और साधक की समस्त मनोकामना की पूर्ति में सहायक है.
महाकाली साधना कलियुग में कल्प वृक्ष के समान शीघ्र फल देने वाली है. इसकी साधना सरल होने के साथ ही साथ प्रभाव युक्त है.
इससे भी बड़ी बात यह है कि इस प्रकार की साधना करने से साधक को किसी प्रकार की हानि नहीं होती अपितु उसे लाभ ही होता है.
उच्चाटन प्रयोग
किसी भी व्यक्ति का मन यदि गलत कार्यों में उलझ गया है, तो सही दिशा की ओर के यह उच्चाटन प्रयोग करें.
इसके माध्यम से व्यक्ति का मन उस कार्य से उचट जाएगा और यह पुनः सही मार्ग पर अग्रसर हो जाएगा.
किसी भी शनिवार को काल भैरव गुटिका को पीपल के पत्ते पर स्थापित कर सिन्दूर से पूजन करें, तेल का दीपक लगा दें.
उस व्यक्ति का नाम लिखें जिसको उच्चाटन करना है. निम्न मंत्र का 101 बार उच्चारण करते हुए गुटिका को नदी में विसर्जित कर दें
॥ ॐ हूं अमुकं (नाम जिसका उच्चाटन करता है) हन हन स्वाहा ॥
reference : महाकाली साधना कैसे करे